मच गई होड़ः भारत में बढ़ीं सबसे ज्यादा तनख्वाह
वर्ष 2011 में भारत में कर्मचारियों के वेतन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। जो कंपनी जितना ज्यादा वेतन बढ़ा रही है, वह जॉब मार्केट में उतनी ही आक्रामक मानी जा रही है। क्योंकि वह न सिर्फ अपने कर्मचारियों को रोकने के लिए हर संभव कदम उठा रही है बल्कि ऊंचे वेतन देकर बेहतर प्रतिभाएं अपने यहां लाने को तत्पर है।
निजी क्षेत्र में वेतन पर नजर रखने वाली एचआर कंसलटेंट कपनियों के अनुसार वेतन तो भारत में बढ़े ही हैं, सबसे ज्यादा कर्मचारियों को तरक्की भी यहीं दी जा रही है। आर्थिक मंदी के बाद से पूरी दुनिया में भारत सबसे तेजी से विकास के रास्ते पर है। यूरोपीय देश और अमेरिका हमसे पीछे हैं ही। एशिया पेसेफिक में भी चीन, कोरिया और जापान जैसे सभी देशों को भी हमने वेतन बढ़ोतरी के मामले में पीछे छोड़ दिया है। औसतन 12.9 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ शीर्ष पर हैं हम।
हमारे यहां वेतन वृद्धि अगले कुछ और वर्षों में दस प्रतिशत से ज्यादा दर से जारी रहेगी। जबकि बाकी देशों में औसत वेतनवृद्धि 10 प्रतिशत से कम होगी। यह देश में बढ़ रही खपत, इंफ्रास्ट्रक्चर में ज्यादा निवेश, सेवा क्षेत्र में लगातार गति की वजह से है। मुद्रास्फीति भी अच्छे इंक्रीमेंट का बड़ा कारण है। इनमें भी सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी बीच के स्तर के कर्मचारियों को मिली है। जो आमतौर पर ऑपरेशनल यानी कंपनी के काम को कार्यान्वित करते हैं। शीर्ष पदों पर यानी प्लानिंग करने वालों और निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतन अपेक्षाकृत कम बढ़े हैं।
भारत लगातार है टॉप पर, जापान सबसे पीछे
पिछले दो सालों में भारत ने वेतन बढ़ाने के मामलों में सबको पीछे छोड़ दिया है। इस वर्ष जहां हमारे यहां तनख्वाह औसतन 12.9 प्रतिशत बढ़ी है वहीं पिछले साल 11.7 प्रतिशत बढ़ी थीं। जबकि 2009 में मंदी के चलते यह प्रतिशत केवल 6.6 ही था। मंदी के दौर के बाद कंपनियों ने इंक्रीमेंट्स लगभग दोगुने से भी ज्यादा बढ़ाए। जहां 2009 में अमेरिका और यूरोप में वेतन बढ़ने की बात तो दूर, लोगों की नौकरियां जा रही थीं वहीं भारत में इंक्रीमेंट्स हुए। भारत के अलावा चीन, जापान, सिंगापुर आदि सभी एशियाई देशों में लोगों के वेतन में 2 प्रतिशत से 9 प्रतिशत तक ही बढ़ोतरी हुई। सबसे ज्यादा वेतन चीन में बढ़े -9 प्रतिशत, फिलीपीन्स में 7 प्रतिशत तो जापान में सबसे कम 2 प्रतिशत वेतन बढ़े।
सुपरवाइजर्स को सबसे ज्यादा इंक्रीमेंट
अगर कंपनियों में अलग-अलग लेवल पर इंक्रीमेंट की बात करें तो एंट्री लेवल और जनरल स्टाफ सबसे ज्यादा फायदे में हैं। इस लेवल पर इस साल 12.4 प्रतिशत वेतन वृद्धि हो रही है। जूनियर मैनेजर और सुपरवाइजर्स को 13.3 प्रतिशत वेतन वृद्धि के साथ सबसे ज्यादा हाइक मिला है। मिडिल मैनेजमेंट में यह 12.9 प्रतिशत और टॉप लेवल पर 12.1 प्रतिशत है।
जॉब इंडेक्स
नौकरीडॉटकाम ने 2008 में सेंसेक्स की तर्ज पर ही एक जॉब इंडेक्स बनाया था। इससे यह मालूम चलता है कि देश में कितनी नौकरियां उपलब्ध हंै। 2008 में इसका बेस पॉइंट 1000 रखा गया। 2009 में मंदी के दौरान यह अपने सबसे निचले स्तर 700 तक चला गया था। दो महीने पहले यह अपने सबसे ऊंचे स्तर 1085 था। अप्रैल में यह 1062 पर था। नौकरीडॉटकाम के सीईओ हितेश ओबेरॉय कहते हैं कि अप्रैल के महीने में अप्रेजल होने के कारण नौकरी बदलने वालों की संख्या कम होती है। इसीलिए जॉब इंडेक्स भी गिर जाता है। यही हालत अक्टूबर-नवंबर में दीवाली के आसपास भी होती है। अगले कुछ महीनों में इंडेक्स के तेजी से चढ़ने की संभावना है।
कैसे बढ़े वेतन ?
हर साल इंक्रीमेंट्स के समय हर कर्मचारी यही सोचता है कि उसका वेतन कैसे बढ़े। माफोई के ई बालाजी बताते हैं कि इसके लिए कुछ मापदंड हैं जैसे आपके लक्ष्य, के आर ए और के पी आई आदि, जिनसे सीधे सीधे किसी भी एम्पलॉइ का परफोर्मेन्स तय किया जा सकता है। जैसे कि आपने अपने लिए तय किए गए लक्ष्य को पूरा किया या नहीं। के आर ए (की रिजल्ट एरिया) यानी मुख्य जिम्मेदारियां और परिणाम। हर कंपनी में हर एम्पलाई के लिए कुछ जिम्मेदारियां तय कर दी जाती हैं और उसी के अनुसार रिजल्ट लाना होता है।
के पी आई यानी की परफोर्मेन्स इंडिकेटर:
कोई भी कंपनी सफलता या मुनाफे के लिए की गई एक्टिविटी के लिए इस्तेमाल करती है। यह विभाग से विभाग के लिए बदलती है जैसे फाइनेंस विभाग के लिए की परफोर्मेन्स इंडिकेटर अलग होगा और सेल्स के लिए यह कुछ और ही होगा।
क्रिएटिविटी और इनोवेशन हैं अहम
की परफोर्मेस इंडिकेटर में आप जैसे ही इन इंडिकेटर्स को अचीव कर लेते हैं, आप खुद ब खुद अच्छे एम्पलॉई घोषित कर दिए जाते हैं जैसे 10/10 कस्टमर सेटिस्फेक्शन या फिर एरर फ्री या जीरो एरर वर्क। ऐसे में जिन एम्पलॉइज के काम से कस्टमर खुश है या उनके काम में गलती नहीं है या सफलता पूर्वक उन्होंने अपना प्रोजेक्ट पूरा किया है, ऐसे एम्पलॉई को हमेशा अच्छे इंक्रीमेंट्स मिलते हैं।
इसके अलावा क्रिएटिविटी, इनोवेशन, आइडेइशन, रिस्क फैक्टर और टीमवर्क जैसे फैक्टर्स भी हैं जो वेतन वृद्धि तय करते हैं। जैसे कि कौनसे कर्मचारी हमेशा नए आइडियाज लेकर आते हैं या आउट आफ द बॉक्स (गैर पारंपरिक) आइडायज लाते हैं और उन पर काम करते हैं।
रिस्क फैक्टर, ऐसे कर्मचारी जो हमेशा जोखिम लेने को तैयार रहते हैं। नए नए प्रोजेक्ट्स को बनाते और संभालते हैं, वे भी इंक्रीमेंट्स की लिस्ट में ऊपर रहते हैं। आप एक टीम में कैसा काम कर रहे हैं, कहीं दूसरे लोगों को आपसे शिकायत तो नहीं या आप खुद को एक ग्रुप में सहज महसूस नहीं करते हैं। तो ये सब चीजें भी कहीं न कहीं तनख्वाह बढ़ाने के लिए अप्रेजल किए जाते समय अहम रोल अदा करती हैं।
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